(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

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॥ श्रीः ॥
11.22. अध्यायः 022
Mahabharata - Strii Parva - Chapter Topics
गान्धार्या कृष्णम्प्रति बाह्लिकादीनां तथा तत्स्त्रीणां च प्रदर्शनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Strii Parva - Chapter Text

गान्धार्युवाच। 11-22-0x(5357)(65422)
आवनत्यं भीमसेनेन भक्षयन्ति निपातितम्।
गृध्रगोमायवः शूरं दूरबन्धुमबन्धुवत्॥ 11-22-1(65423)
तं पश्य कदनं कृत्वा शूराणां मधुसूदन।
शयानं वीरशयने रुधिरेण समुक्षितम्॥ 11-22-2(65424)
तं सृगालाश्च कङ्काश्च क्रव्यादाश्च पृथग्विधाः।
तेनतेन विकर्षन्ति पश्य कालस्य पर्ययम्॥ 11-22-3(65425)
शयानं वीरशयने शूरमाक्रन्दकारिणम्।
आवन्त्यमभितो नार्यो रुदत्यः पर्युपासते॥ 11-22-4(65426)
प्रातिपेयं महेष्वासं हतं भीमेन बाह्लिकम्।
प्रसुप्तमिव शार्दुलं पश्य कृष्णमनस्विनम्॥ 11-22-5(65427)
अतीव मुखवर्णोऽस्य निहतस्यापि शोभते।
सोमस्यवाभिपूर्णस्य पौर्णमास्यां समुद्यतः॥ 11-22-6(65428)
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञां चाभिरक्षता।
पाकशासनिना सङ्ख्ये वार्धक्षत्रिर्निपातितः॥ 11-22-7(65429)
एकादशचमूर्भित्त्वा रक्ष्यमाणं महात्मभिः।
सत्यं चिकीर्षता पश्य हतमेनं जयद्रथम्॥ 11-22-8(65430)
सिन्धुसौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम्।
भक्षयन्ति शिवा गृध्रा जनार्दन जयद्रथम्॥ 11-22-9(65431)
संरक्ष्यमाणं भार्याभिरनुरक्ताभिरच्युत।
भीषयन्त्यो विकर्षन्ति गहनं निम्नमन्तिकात्॥ 11-22-10(65432)
तमेताः पर्यपासन्ते वीक्षमाणा महाभुजम्।
सिन्धुसौवीरकाम्भोजगान्धारयवनस्त्रियः॥ 11-22-11(65433)
यदा कृष्णामुपादाय प्राद्रवत्केकयैः सह।
तदैव वध्यः पाण्डूनां जनार्दन जयद्रथः॥ 11-22-12(65434)
दुःशलां मानयद्भिस्तु तदा मुक्तो जयद्रथः।
कथमद्य न तां कृष्ण मानयन्ति स्म ते पुनः॥ 11-22-13(65435)
सैन्धवं मे सुता बाला प्रस्स्वलन्तीव दुःखिता।
प्रमापयन्ती चात्मानमाक्रोशन्तीव पाण्डवान्॥ 11-22-14(65436)
किन्नु दुःखतरं कृष्ण परं मम भविष्यति।
यत्सुता विधवा बाला स्नुषाश्च निहतेश्वराः॥ 11-22-15(65437)
हाहा धिग्धुःशलां पश्य वीतशोकभयामिव।
भर्तुः शिर अपश्यन्तीं धावमानामितस्ततः॥ 11-22-16(65438)
वारयामास यः सर्वान्पाण्डवान्पुत्रगृद्विनः।
स हत्वा विपुलाः सेनाः सर्वयं मृत्युवशं गतः॥ 11-22-17(65439)
तं मत्तमिव मातङ्गं वीरं परमदुर्जयम्।
परिवार्य रुदन्त्येताः स्त्रियश्चन्द्रोपमाननाः॥ ॥ 11-22-18(65440)

इति श्रीमन्महाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि द्वाविंशोऽध्यायः॥ 22 ॥

Mahabharata - Strii Parva - Chapter Footnotes
11-22-7 बार्धक्षत्रिर्जयद्रथः॥ 11-22-22 द्वाविंशोऽध्यायः॥


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